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Monday, July 1, 2019

सेंसर के बीच सिनेमा

सिनेमा फ्रांस से निकल कर आज पूरी दुनिया में छा  गया है। हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक और रूस से लेकर चीन तक, सिनेमा ने हर देश, संस्कृति और विचारधारा की सरहदों को पार कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। भारत की सीमाओं में झांक कर देखा जाए तो सिनेमा ने अपनी अलग जगह बनाई है। यहां सिनेमा किसी एक धारा में बंधा नहीं है। यहां सिनेमा को लेकर कई तरह के प्रयोग किए गए हैं।
भारत विश्व में सबसे ज्यादा फिल्मों का निर्माण करने वाला देश है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन के आंकड़ों को आधार माना जाए तो भारत में हर साल 1000 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण होता है। एक पिछड़े देश में इतनी भारी संख्या में फिल्मों का बनना निश्चित रूप से सबको हैरान करता है। ऊपर से 'अभिव्यक्ति  की आजादी' पर सेंसर की कैंची हमेशा चलने को तैयार रहती हो, ऐसे में साल-दर-साल फिल्मों का बढ़ता निर्माण ये बताता है कि भारत का समाज सिनेमा की हर धारा को पूरी आत्मीयता से स्वीकार करती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1)  में वाक् एवं अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में जिक्र है, लेकिन इसी अनुछेद यानि 19 (2) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की आजादी पर कुछ बंधन भी लगा दिए गए हैं ताकि अभिव्यक्ति अमर्यादित न हो। सिनेमा की ताकत को पहचानते हुए सरकार ने सिनेमाटोग्राफ एक्ट 1952 के तहत सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सेंसर्स का गठन 1950 में किया गया और इसका कार्यालय बंबई में खोला गया ।  इसके अलावा देश के कई शहरों में इसके क्षेत्रीय कार्यालय खोले गए। 1 जून 1983 से सेंसर बोर्ड सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन  के नाम से कार्य करने लगा। इस बोर्ड से पास होने के बाद ही किसी फिल्म को भारत में प्रदर्शित किया जा सकता है। यह बोर्ड सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इसमें एक अध्यक्ष और 25  गैर सरकारी सदस्य होते हैं जिन्हें भारत सरकार नियुक्त करती है। इनका कार्यकाल तीन साल का होता है।इनमें अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों को शामिल किया जाता है। इस  बोर्ड में एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानि सीईओ भी होता है जो सरकारी अधिकारी होता है। फिल्म उद्योग का एक धड़ा फिल्म सेंसरशिप का शुरू से विरोध करता आ रहा है। इस वर्ग का मानना है कि अभिव्यक्ति  और रचनात्मकता की आजादी पर  सेंसरशिप के रूप में ये सरकारी नियंत्रण अनुचित है। वहीं बुद्धिजीवियों की एक जमात का मानना है कि सिनेमा पर सेंसरशिप का पहरा समाज और सिनेमा दोनों के हित में है। 

Sunday, June 2, 2019

सफलता की कोशिश जरूरी है

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। तो क्या कोशिश करने मात्र से सफलता मिल जाती है?  यदि ऐसा है तो फिर बिना किसी देरी के कोशिश शुरू करनी चाहिए। सवाल ये है कि आखिर कोशिश किस दिशा में और कितनी मात्रा में की जाए, जिससे सफलता मिल जाए। जिस मंजिल की ख्वाहिश है वो मंजिल हासिल हो जाए। मगर सपनों को सच करने का तरीका क्या होगा? वो कौन सी प्रक्रिया है जिसके अधीन रहकर इंसान अपनी सफलता की कहानी लिखेगा?  कई लोग कोशिश करते हैं। कई ईमानदारी से करते हैं तो कई खानापूर्ति मात्र करते हैं। जो ईमानदारी से कोशिश करते हैं उनमें भी सफलता का प्रतिशत 100 फीसदी नहीं है। जो सौ फीसदी ईमानदार नहीं है उनकी बात करना बेमानी है, लेकिन जो ईमानदार हैं उन पर चर्चा तो की जा सकती है। चर्चा का मूल कोशिश है। इस कोशिश का अंजाम क्या होगा? ये सवाल हर कोशिश करने वाले के मन में उमड़ता होगा। उमड़ना भी चाहिए ताकि ये ख्याल रहे कि हमारी कोशिश का सौ फीसदी रिजल्ट हमें मिले। कोशिश करने के दौरान प्रेरणा भी लेनी चाहिए ताकि आपके संकल्प को और मजबूती मिल सके। इस मामले में अब्राहम लिंकन का उदाहरम देना उचित होगा जो लगातार असफल होने के बावजूद अपने इरादे पर अडिग रहे और गरीबी से निकल कर अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बन गए। दुनिया में उदाहरण कई हैं। सबका जिक्र करने के लिए जगह की कमी पड़ जाएगी। लिहाजा अब्राहम लिंकन के उदाहरण से कोशिश की अहमियत को समझा जा सकता है। अब्राहम लिंकन की सफलता तो काफी प्रेरणा देती है। अब भारत की बात कर ली जाए। यहां अब उस उदाहरण को समझने की कोशिश की जाए जिसको ज्यादातर लोग किस्मत कनेक्शन से जोड़ देते हैं। लालकृष्ण आडवाणी की किस्मत में भारत का प्रधानमंत्री बनना नहीं लिखा था। जाहिर है वो पीएम इन वेटिंग ही रह गए। सवाल है क्या आडवाणी की कोशिश में कोई कमी रह गई थी जिसके चलते उनकी किस्मत पीएम पद से कनेक्ट नहीं हो पाई। अब तो शायद आडवाणी ने हार भी मान ली है। राजनीतिक से संन्यास ले लिया है। राजनीतिक करियर खत्म हो गया । आडवाणी की कोशिश पर रिसर्च होनी चाहिए। उस रिसर्च पेपर की भारी डिमांड होगी। आखिर आडवाणी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन पाए? दो उदाहरण सामने हैं। सफलता और असफलता जिंदगी के दो पहलू हैं। इसे मानकर चलना भी चाहिए। कहते भी है कि सफलता आपके आगे के रास्ते खोल देती है आपकी कोशिश को थोड़ा आसान कर देती है। तो वहीं असफलता आपको परिपक्व बनाती है। आप अपने लक्ष्य के प्रति और गंभीर हो जाते हैं। असफलताओं से लड़ कर कर आप जब सफल होते हैं तो फिर लोग सफल होने का पूरा क्रेडिट आपको देते हैं न कि आपकी किस्मत को। तो सफलता का पूरा क्रेडिट लेना है तो असफलता से घबड़ाए नहीं, बल्कि उसे अपनी ईमानदार कोशिश का हिस्सा स्वीकार करें ताकि सफलता की एक कहानी आप भी लिख सकें। 

Tuesday, May 21, 2019

देश में चल क्या रहा है?

सवाल सीधा है लेकिन जवाब घुमा-फिरा कर दिया जा सकता है। सवाल है आखिर देश में चल क्या रहा है ? टीवी पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक किरदार कहता है फॉग चल रहा है। वैसे यहां डिस्क्लेमर लगाना अच्छा रहेगा कि इस पोस्ट में किसी ब्रांड का प्रचार करने का कोई इरादा नहीं है। ब्रांड पर याद आया कि आजकल देश में मुद्दों को ब्रांड बना लिया गया है। राजनीति के कारोबार में सबने अपना अपना ब्रांड तैयार कर लिया है। मिसाल के तौर पर ब्रांड राष्ट्रवाद के मुकाबले ब्रांड न्याय मौजूद है। ब्रांड के नाम पर डर परोसा जा रहा है। आजकल डर का इस्तेमाल मुनाफाखोरी के लिए बखूबी किया जा रहा है। अब ये कौन कर रहा है इस पर अलग से रिसर्च पेपर लाने की जरूरत है। अहम बात ये है कि यदि मतदाता डरेगा तो फिर वो वोट कैसे देगा? फिर मतदाता को पोलिंग बूथ तक लाने की कवायद का क्या होगा? वैसे लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए कई सारी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन हर बार यही आरोप लग जाता है कि इन योजनाओं के नीचे कभी जमीन नहीं है तो कभी आकाश नहीं है। आसमान में बादल हैं लेकिन धरती पर अनाज नहीं है। कोई भूख से मरा जा रहा है तो कोई प्यास से हलाकान है। सबके अपने-अपने दर्द हैं। सब कहीं-न-कहीं लाचारी की बीमारी से ग्रस्त हैं। देश की आबादी भले ही 130 करोड़ के आसपास है लेकिन सब अकेले हैं। किसी को सवाल पूछने में डर लगता है तो किसी को जवाब देने में । जो सत्ता पर बैठा है उसे अपनी गद्दी बचाने की चिंता सता रही है तो जो सत्ता में नहीं हैं उनमें सत्ता छीनने की होड़ मची है। ऐसे में जनसरोकार के मुद्दों की तस्वीर धुंधली पड़ती जा रही है। जाहिर है इसे देश के लिए बेहतर संकेत तो नहीं कहा जा सकता।