कहीं इतिहास न बन जाए रिक्शा ?

(बेतिया, पश्चिम चंपारण) शहर में तनाव बहुत है। लोग बीमार पड़ रहे हैं। बीमारी से बचने के लिए लोग
सुबह टहलने भी जा रहे हैं, मगर फायदा शून्य है। धीरे-धीरे लोगों का सुकून भी छीन रहा है। फरियाद करे तो किससे करें, उससे जिसने शहर को जहरीले धुएं की अंधी खाई में धकेल दिया है। जो शहर कभी तांगे और रिक्शे से आबाद रहता था। जिसके चलते शहर सुकून से जीता था। आज वही शहर प्रदूषण के मार से से अपनी आंखों की रोशनी खो रहा है। जहरीले धुएं की जद में आकर उसके फेफड़े खराब हो रहे हैं। ऑटो का शोर इतना है कि कान के पर्दे फट रहे हैं, मगर इस शोर के बीच कोई नहीं है जो शहर की तकलीफ को सुन सके। हालांकि अभी भी रिक्शे पर मेहनत का पसीना बहता है। आज भी हाड़-मांस का आदमी रिक्शे को चलाकर अपने घर की रोजी-रोटी चलाता है। अभी भी काफी संख्या में रिक्शे सड़कों पर चलते दिख जाएंगे। मगर ऐसा लगता है कि ये सब अब बीते दिनों की बात हो जाएंगे। दुख की बात है कि कभी तांगे की सवारी कर के जो आनंद मिलता है। अब वो आनंद देने वाला तांगा धीरे-धीरे गायब हो रहा है। सड़कों पर घोड़ों की जगह मशीनें दौड़ रही हैं। उन मशीनों से बस रिक्शेवाले ही मुकाबला कर रहे हैं। मगर ये मुकाबला कब तक होगा? कब तक रिक्शा अपने वजूद के लिए लड़ेगा ? मगर शहर का मिजाज भी देखिए, ऑटो की सवारी लाख सस्ती है, लेकिन अच्छी-खासी आबादी आज भी रिक्शे से चलना पसंद करती है। जबकि ऑटो के मुकाबले रिक्शे की सवारी महंगी है। लेकिन उसकी फिक्र यहां के लोगों को नहीं है। वहीं रिक्शा चलाने वालों की भी मजबूरी है। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि उन्हें अपनी मेहनत की कीमत बढ़ानी पड़ रही है। 

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