चढ़ावा, बढ़ावा और सुशासन का दावा !

बेतिया  (पश्चिम चंपारण)  बिहार भारत में है इसको लेकर कोई विवाद नहीं है। लेकिन भारत की जो तहजीब
और सिस्टम है पता नहीं क्यों उसे बिहार अपना नहीं पा रहा है। सुशासन का दावा करने वाली बिहार की नीतीश सरकार का दावा फेल दिखता है। बिहार की सड़कों पर दौड़ने वाली बसों में एक बार सफर तो कीजिए, आप भी कहेंगे कहां आ के फंस गए। जी हां...बिहार के परिवहन व्यवस्था की ऐसी बदहाल हालत है कि आप दोबारा बिहार की बसों में सफर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे। बसों की छत पर बैठकर यात्रा करना तो आम बात है ही। बस के अंदर भी लोगों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंसा जाता है। मनमाने किराए वसूले जाते हैं। विरोध करने पर मारने-पीटने की धमकियां मिलने लगती है।  इस दौरान कंडक्टर का तेवर देखते बनता है। बात अब अधिनियम की। बस में उपलब्ध सीटों से ज्यादा लोगों को बस में एंट्री नहीं दी जा सकती। लेकिन सीटों की कौन कहें बस में इतने लोगों को ठूंस दिया जाता है जैसे लगता है कि दम घूट जाएगा।  बस में किराया डिस्प्ले होना चाहिए। जो नहीं होता है। जिसके चलते बस का कंडक्टर मनमाना किराया वसूलता है। कंडक्टर टिकट देता नहीं । जो देता है उसमें न गाड़ी का नंबर होता है और न ही बस का नाम। जिसके चलते आप बस संचालक के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में आप शिकायत भी नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए 21 नवंबर की यात्रा का उदाहरण बिहार की परिवहन व्यवस्था को समझने में मदद करेगा। पटना से नॉन-एसी शीत बसंत नाम के बस में यात्रा शुरू किया गया। इस दौरान कंडक्टर ने पटना से बेतिया के लिए 180 रुपए के हिसाब से दो लोगों के 360 रुपए काटे और टिकट के नाम पर शीत बसंत नाम के साथ किराए का उल्लेख करते हुए एक छोटा सा कागज थमा दिया। बस मुजफ्फरपुर पहुंची। मुजफ्फरपुर से बस मोतिहारी के लिए रवाना हुई। बस मोतिहारी बस स्टैंड में आकर खड़ी हो गई और बेतिया जाने वाले सभी यात्रियों को बस से उतार दिया गया और उन्हें शीत बसंत की वातानुकूलित बस में बैठने का फरमान सुना दिया गया। खैर ठंडी के दिनों में एसी बस में बैठना एक अलग अनुभव रहा। एसी बस का कंडक्टर आया और उसने बेतिया के लिए जारी किया हुआ टिकट मांग कर अपने पास रख लिया और उल्टा एसी के नाम् पर 20 रुपए की उगाही कर ली। 20 रुपए नहीं देने पर एक हजार रुपए तक वसूलने की धमकी भी दे दिया। जानकारी के मुताबिक बिहार में परिवहन विभाग जिंदा है, लेकिन कहा जाता है कि वो जिंदा लाश है। बिहार सरकार किसी तरह उसे ढो रही है। लाश सड़ कर दुर्गन्ध न देने लगे इसको लेकर सरकार सक्रियता तो दिखाती है मगर लाश तो आखिर लाश ही है, वो जिंदा कैसे होगी। उसे तो बस अपने कफन का इंतजार है।   

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