एक पीएम, एक चादर और कई सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब तक उन्हें मुस्लिम विरोधी माना जाता था, लेकिन जैसे ही उऩ्हें दिल्ली की गद्दी मिली। उन्होंने अपने छवि को बदलने की कवायद शुरू कर दी। चाहे मौलवी, मुल्लाओं से मिलना हो या फिर अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर अपनी तरफ से चादर भेजने की बात हो। ये साफ संकेत दे रहे हैं कि पीएम मोदी सबका साथ सबका विकास की राह पर चलना शुरू कर दिया है। अच्छा भी है, क्योंकि इस बात को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता है। मुस्लिम भी इस देश के नागरिक हैं। वो भी चुनाव में काफी हद तक प्रभाव डाल सकते हैं ऐसे में मोदी ने इस तबके को लुभाना शुरू कर दिया  है। जब तक वो गुजरात के  मुख्यमंत्री रहे मीडिया ने मानो उऩ्हें मुसलमानों का 'कातिल' की घोषित कर दिया था। गोधरा के कलंक को धोना नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी चुनौती है। मगर कहते है ना, सही रास्ते पर चलने से मंजिल जरूर मिल जाती है। नरेंद्र मोदी मुसलमानों को कितना लुभा पाएंगे? ये अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इस कदम को इमेज बदलने की कवायद से जोड़ कर देखना ही सही होगा। हालांकि हज सब्सिडी खत्म करके उन्होंने मुसलमानों को कड़वी गोली तो खिला ही दी है। इसलिए ये भी साफ तौर पर कहना गलत होगा कि वो मुसलमानों को लुभा में जुट  गए हैं। ये कहना गलत ही होगा कि इस वोटबैंक पर मोदी की नजर है। अब तक ये वर्ग कांग्रेस, सपा, राजद का ही वोटबैंक रहा है। बड़ा सवाल यही है कि विकास के नाम पर  मुुस्लिम वर्ग मोदी के साथ कदम मिलाकर चलना मंजूर करेगा। गौरतलब है कि मोदी और मुस्लिम वर्ग के बीच बाबरी मस्जिद का विवाद मौजूद है। लेकिन इस विवाद से अब तक मोदी की सरकार पल्ला झाड़ती ही नजर आई है। तमाम हिन्दुवादी संगठन बाबरी मस्जिद पर राम मंदिर बनाने के लिए भारी दबाव डाल रहे हैं। ऐसे में इस बात को समझना बेहद जरूरी है कि आखिर मोदी की रणनीति क्या है? वो अपने जनसभाओं में बार-बार दोहराते हैं कि वो सवा सौ करोड़ भारतीयों के प्रधान सेवक हैं। अब इस प्रधान सेवक की सेवा से मुस्लिम वर्ग कितना संतुष्ट होगा। भविष्य में इस पर चर्चा हो सकती है।भगवाधारियों को डर ये भी है कि कल तक वो कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे थे, यदि पीएम मोदी ही मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलने लगे तो फिर भगवाधारियों के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं  होगा। 

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