जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन

आखिरकार जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी का तीन साल का रिश्ता टूट गया। भाजपा ने मुख्यमंत्री महबूबा
साभार: JKDIPR
मुफ्ती को झटका देते हुए अपना समर्थन वापस ले लिया। हालांकि भाजपा और पीडीपी की गठबंधन वाली सरकार बनी थी तभी कई राजनीतिक पंडितों को हैरानी हुई थी। राजनीति पर पकड़ रखने वाले कई शख्सियतों ने इस गठबंधन को बेमेल करार दिया था। यहां ये भी कहना जरूरी है कि जम्मू-कश्मीर के विकास के नाम पर बीजेपी और पीडीपी ने जिस तरह से हाथ मिलाया था, उसी तरह अपना  हाथ झटक दिया। जम्मू-कश्मीर के विकास के ऊपर राजनीतिक दलों का स्वार्थ हावी हो गया। यही वजह है कि पूरे देश में भाजपा के खिलाफ विपक्ष एकजुट हो रहा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में पीडीपी का साथ न तो नेशनल कॉन्फ्रेंस दे रही है और न ही कांग्रेस कोई रुचि ले रही है। बताया जा रहा है कि समर्थन वापसी के पीछे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का दिमाग कर कर रहा है। दरअसल गुजरात और कर्नाटक में भाजपा के औसत प्रदर्शन  के चलते अमित शाह को समझ में आ गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में न तो हिन्दुत्व का एजेंडा काम आएगा और न ही विकास का जुमला। लिहाजा उन्होंने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा पकड़ लिया। जिस पर पूरा देश एक हो सकता है। जिसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है! यही वजह है कि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने घाटी में सीजफायर को खत्म कर दिया है और सेना को आतंकियों से जोरदार तरीके से निपटने के निर्देश दिए हैं। जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राम माधव ने पीडीपी से नाता तोड़ने के पीछे जो तर्क दिए हैं, उसके मुताबिक मुख्यमंत्री अलगाववादियों के खिलाफ कुछ ज्यादा ही नरमी दिखा रही थीं। केंद्र सरकार ने रमजान के मौके पर सीजफायर की घोषणा की थी, लेकिन आतंकी और अलगाववादी अपनी हरकतों से बाज नहीं आए। भाजपा ने मुख्यमंत्री पर सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाके कश्मीर के विकास पर ध्यान देने का आरोप लगाया। बीजेपी के मुताबिक महबूबा मुफ्ती जम्मू और लद्दाख के विकास पर ध्यान नहीं दे रही थीं। गौरतलब है कि जम्मू हिन्दू बहुल और लद्दाख बौद्ध बहुल क्षेत्र है। इसके साथ ही भाजपा पत्थरबाजों को माफ करने पर भी नाराज है। कठुआ कांड भी समर्थन वापसी की एक वजह मानी जा रही है। फिलहाल जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए कोई भी दल या गठबंधन सामने नहीं आ रहा। बताते चलें कि 2014 के दिसंबर महीने में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें पीडीपी को 28 सीटें, भाजपा को 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस को 15, कांग्रेस को 12 और अन्य को 7 सीटें मिली थी। इस तरह 87 विधानसभा सीटों में सरकार बनाने के लिए 44 सीटें जरूरी है, लेकिन यहां भाजपा के सभी विरोधी एकजुट होकर सरकार बनाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। जिसके चलते राज्यपाल एन एन वोहरा ने राज्य में राज्यपाल शासन लागू करने की सिफारिश राष्ट्रपति से कर दी, जिसके बाद राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया है। कहना गलत नहीं होगा कि बीजेपी ने जम्मू कश्मीर में समर्थन वापस लेकर धारा 370 के साथ 2019 में लोकसभा की चुनावी परीक्षा पास करने की तैयारी में है। 

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