'कमल' के रास्ते पर कमलनाथ !

मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर जो तीर छोड़े हैं, क्या वो निशाने पर लग पाएगा ? क्या कांग्रेस की हुंकार रैली शिवराज के साम्राज्य को तहस-नहस कर देगी ? इस जवाब के लिए 2019 के जनवरी या फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार करना होगा।
शिवराज की लोकप्रिय छवि कांग्रेस के लिए एक तिलिस्म है। व्यापमं घोटाला जैसा बड़ा कांड शिवराज की कुर्सी नहीं हिला पाया, ऐसे में वाजिब सवाल उठता है कि क्या सिर्फ हुंकार रैली और एकता रैली करने से इस तिलिस्म को तोड़ा जा सकता है? कतई नहीं, क्योंकि अतीत गवाह है कि जब सत्यदेव कटारे विधानसभा में कांग्रेस की ओर से नेता प्रतिपक्ष थे तो उस समय उन्होंने व्यापमं के मुद्दे पर शिवराज सरकार को जोरदार तरीके से घेरा था। शिवराज सरकार में मंत्री रहे लक्ष्मीकांत शर्मा को जेल जाना पड़ा था। उस वक्त प्रदेश कांग्रेस जिस प्रचंड शक्ति के साथ शिवराज सरकार की नींद उड़ा दी थी, वो  हालात अब नजर नहीं आ रहे हैं। अब जो नजर आ रहा है वो है गुटबाजी। अंदरुनी कलह से कांग्रेस परेशान है।  हालांकि गुटबाजी उस वक्त भी थी, लेकिन उस समय गुटबाजी के बीच में ही कांग्रेस का हमला धारदार होता था, जो अब नजर नहीं आ रहा। पीसीसी के अध्यक्ष पद से अरुण यादव को हटाकर कमलनाथ को कमान तो दे दिया गया, लेकिन वो कोई कमाल नहीं दिखा पा रहे हैं। हां, उन्होंने चुनाव जीतने के लिए अपनी रणनीति तय कर ली है। राज्य में लोकप्रियता बटोरने के लिए उन्होंने युवाओं को साधना शुरू कर दिया है। जिस तरह से शिवराज प्रदेशभर में मामा बने फिर रहे हैं तो वहीं कमलनाथ को लगता है कि युवाओं को साधने में यदि वो कामयाब हो जाते हैं तो शिवराज मामा को कंस मामा में तब्दील kकरना कांग्रेस के लिए आसान हो जाएगा।  यही वजह है कि उन्होंने मुरैना में घोषणा की कि जो कंपनी मध्य प्रदेश के युवाओं को नौकरी देगी, उसकी 25 फीसदी सैलरी उनकी सरकार देगी। कमलनाथ युवाओं को साधने के लिए मामला रेत तक ले गए। कमलनाथ ने कहा कि रेत की किल्लत को लेकर उन्हें शिकायत मिलती रहती है। यदि उनकी सरकार आई तो वो नई रेत नीति बनाएंगे जो नौजवानों के लिए होगी। जाहिर है कमलनाथ 'कमल' की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वहीं सिंधिया गुट खुद को युवाओं का प्रतिनिधि मानता है। यदि सत्ता की चाबी युवाओं को देने की बारी आएगी तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सबसे ऊपर है। इसका आत्मविश्वास सिंधिया के चेहरे पर साफ झलकता है। वहीं दिग्गी राजा भी अपनी एकता रथ लेकर प्रदेश की सियासी महाभारत में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। हो सकता है कि कांग्रेस शिवराज के तिलिस्म को तोड़ने में कामयाब हो जाए तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी अनुभव के आधार पर मौका मिल सकता है। अरुण यादव, सुरेश पचौरी समेत कई कांग्रेसी नेता हैं जो अभी से सत्ता पर विराजमान होने के सपने देख रहे हैं, लेकिन मुश्किल यही है कि आखिर शिवराज की लोकप्रियता का तिलिस्म कैसे टूटेगा और कौन तोड़ेगा ? 

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