आखिरकार मान गया 'बस्तर के शेर' का बेटा


जगदलपुर: आखिरकार छविंद्र कर्मा ने अपनी मां और दंतेवाड़ा से कांग्रेस की प्रत्याशी देवती कर्मा
अपील मान ली। खुद देवती कर्मा बागी हुए अपने बेटे छविंद्र को मनाने पहुंची। वहीं छविंद्र ने भी मां की बात मान ली और निर्दलीय चुनाव लड़ने का अपना फैसला बदल दिया। मां बात मानकर छविंद्र चुनाव मैदान से हट गए हैं। अब इसे पॉलिटिकल ड्रामा कहें या फैमिली ड्रामा। बहुत मंथन करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि महेंद्र कर्मा ने अपने पीछे जो विरासत छोड़ दी है उसे सहेजने की कोशिश देवती कर्मा ने भी की और छविंद्र कर्मा ने भी। आखिर परिवार के सभी सदस्य छविंद्र कर्मा को अपनी मां के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ने के लिए मना रहे थे। छविंद्र कर्मा की पहचान सिर्फ इतनी है कि वो महेंद्र कर्मा के बेटे हैं। बस्तर संभाग में महेंद्र कर्मा वो नाम है जिससे नक्सली भी खौफ खाते थे। नक्सलियों से लड़ने के लिए महेंद्र कर्मा ने ही सलवा जुलूम की नींव रखी थी। जाहिर है राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर महेंद्र कर्मा का विजन सराहनीय था। महेंद्र कर्मा ने 2005 में सलवा जुडूम की शुरुआत की थी, लेकिन 2008 में सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति के बाद इसे बंद करना पड़ा। तब से नक्सली महेंद्र कर्मा के जानी दुश्मन बन गए। महेंद्र कर्मा ने नक्सलियों से जमकर लोहा लिया। उनकी ईंट से ईंट बजा दी। लेकिन 26 मई 2013 का दिन वो मनहूस समय था जब 100 से भी ज्यादा नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। इस हमले में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल समेत कई नेता मारे गए। नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा को ढूंढ कर बड़ी बेहरमी से गोलियों से भून दिया। महेंद्र कर्मा कांग्रेस के कदावर नेता थे। वो प्रदेश में औद्योगिक मंत्री भी रहे। 2004 से 2008 तक वो विधानसभा में कांग्रेस की ओर से नेता प्रतिपक्ष भी रहे। बस्तर के इस टाइगर का कुनबा बड़ा है ऐसे में जाहिर है टकराहट तो होगी ही। लेकिन मां-बेटे के बीच टिकट को लेकर तकरार किसी को भी हैरान कर सकता है। मगर 26 अक्टूबर को छविंद्र कर्मा के  नामांकन वापस लेने के बाद सारे विवाद समाप्त हो गए हैं। अब तो कर्मा परिवार का पूरा ध्यान चुनाव जीतने पर रहेगा। बता दें कि छत्तीसगढ़ बनने के बाद 2008 तक दंतेवाड़ा की सीट महेंद्र
कर्मा यानि कांग्रेस के पास थी। लेकिन 2008 में ये सीट बीजेपी के भीमा मंडावी जीत ली। पिछली बार सहानुभूति लहर के चलते देवती कर्मा विजयी हुई, लेकिन इस बार उन्हें भाजपा की तरफ से कड़ी चुनौती मिलने वाली है। भाजपा ने भीमा मंडावी को चुनाव मैदान में उतारकर अपना दांव खेला है। सियासत में सब अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं। पहले चरण में यानि 12 नवंबर को नक्सल प्रभावित विधानसभा सीटों पर मतदान होगा। दूसरे चरण में बाकी बचे 72 सीटों के लिए 20 नवंबर को मतदान होगा। 11 नवंबर को मतगणना होगी जिसके बाद पता चलेगा कि छत्तीसगढ़ की सियासत का असली बादशाह कौन है?

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