फिलहाल तो रमन को अमन नहीं !

    2018 के विधानसभा का चुनावी जंग
    हर एक सीट पर मेहनत लाएगी रंग 
    अब की बार जय जोहार छत्तीसगढ़
    क्या रमन बचा पाएंगे अपना गढ़ ?

छत्तीसगढ़ के मन और माटी में आदिवासी संस्कृति रची-बसी है। तीन बार डॉक्टर रमन सिंह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने और अब चौथी बार के लिए मेहनत शुरू कर दी है। चुनाव प्रचार के लिए रमन सिंह पहली बार वहीं गए, जहां स्वाभाविक तौर पर हर प्रत्याशी जाना चाहेगा। रमन सिंह ने विधायक के लिए राजनांदगांव से पर्चा दाखिल किया है। 26 अक्टूबर को वे राजनांदगांव दौरे पर रहे। कई जगह जनसभाएं भी कीं। खुद को जिताने की जनता से अपील भी की। इन सबके बीच 27 अक्टूबर को मुख्यमंत्री बस्तर के दौरे पर निकलते हैं। यहां वो ये कहते हैं कि उन्होंने यहां इतने विकास कार्य किए हैं कि जनता बाजी पलट देगी। अब जरा पिछले चुनाव का हिसाब-किताब देख लिया जाए। दरअसल बस्तर में 12 सीटें हैं जिनमें चार पर भाजपा के उम्मीदवार जीते थे तो वहीं 8 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। जाहिर है मुख्यमंत्री को बस्तर से काफी उम्मीदें हैं। यही वजह है कि राजनांदगांव के बाद उन्होंने सीधे बस्तर का रुख किया है। अब उस गणित को समझने की कोशिश करते हैं जो रमन सिंह के दिल और दिमाग को परेशान करके रखा हुआ है। छत्तीसगढ़ की सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए रमन उतने सुरक्षित नजर नहीं आते। पिछली बार के चुनाव परिणाम बताते हैं कि इस बार रमन को काफी मेहनत करनी पड़ेगी। 90 सीटों वाले विधानसभा में
पिछली बार 2013 में भाजपा को 49 सीटें मिली थीं वहीं कांग्रेस को 39 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। इस चुनाव में बसपा का एक प्रत्याशी  और एक निर्दलीय उम्मीदवार भी जीता था। 2013 के वोट प्रतिशत की बात कर लें तो बीजेपी को कुल 54.44 फीसदी मत मिले थे जबकि कांग्रेस को 43.33 फीसदी वोट मिले थे। जाहिर है इस बार यदि मतदाता का मन बदला तो रमन सिंह के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। इतना तो तय है कि इस बार के चुनाव में रमन सिंह खुद को असुरक्षित महसूस  कर  रहे हैं। यही वजह है कि विकास यात्रा, फिर अटल विकास यात्रा और अब चुनावी यात्रा पर निकल गए हैं। पहले बस्तर न जाकर उन्होंने राजनांदगांव जाना बेहतर समझा, क्योंकि वो यहां से विधायक बनने के लिए चुनाव मैदान में हैं। यदि वे विधायक का चुनाव हारते हैं और यदि बीजेपी बहुमत हासिल कर लेती है तो हो सकता है उनका राजनीतिक करियर यही खत्म हो जाएगा। शायद यही वजह है कि उन्होंने सबसे पहले राजनांदगांव का रुख किया और मतदाताओं से वोट मांगे। एक विधायक के तौर पर उन्होंने राजनांदगांव को क्या दिया, इसको लेकर उन्होंने मतदाताओं को कितना संतुष्ट किया, ये चुनाव के नतीजे बताएंगे। फिलहाल नामांकन दाखिल करते हुए रमन परिवार ने जिस तरह से योगी आदित्यनाथ का चरण वंदन किया उससे साफ झलकता है कि रमन सिंह के मन में हार का कहीं न कहीं डर छिपा है। अब बात बस्तर की जो लाल आतंक से हमेशा भयभीत रहता है। रमन सिंह यहां के 12 सीटों को भाजपा की झोली में लाना चाहते हैं। पिछली बार सरगुजा संभाग ने भी रमन सिंह को धोखा दिया था। वहां की 8 सीटों में से महज एक पर भाजपा के प्रत्याशी और वर्तमान में गृहमंत्री रामसेवक पैकरा अपनी सीट बचा पाए थे। जाहिर है इस बार भी बस्तर और सरगुजा का गणित गड़बड़ हुआ तो मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह की जीत के सारे समीकरण ध्वस्त हो जाएंगे। फिलहाल रमन सिंह के लिए अच्छी खबर यही है कि कांग्रेस अभी तक अपने प्रत्याशियों के नाम फाइनल नहीं कर पाई है जिसका फायदा रमन सिंह एंड कंपनी को मिल सकता है। कांग्रेस ने पहले 12 फिर 6 प्रत्याशियों की लिस्ट जारी की। दूसरे चरण के नामांकन की प्रक्रिया चल रही है और कांग्रेस में टिकट के दावेदार आस लगाकर बैठे हैं कि उन्हें टिकट मिलेगा तो वो चुनाव मैदान में उतरेंगे। सूत्रों के हवाले से खबरें बहुत आ रही हैं। मगर लिस्ट की पुष्टि न तो पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल कर रहे हैं और न ही नेता  प्रतिपक्ष टी एस सिंहदेव। जाहिर है कांग्रेस की इस लेटलतीफी का खामियाजा आखिरकार कांग्रेस को ही भुगतना है। फिलहाल तो रमन सिंह अपने उड़नखटोले पर बैठक छत्तीसगढ़ की जनता से वोट मांगने निकल पड़े हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पहले चरण में 18 सीटों पर मतदान 12 नवंबर को होगा वहीं बाकी बचे 72 सीटों के लिए मतदान 20 नवंबर को होगा। इसके बाद 11 दिसंबर को मतगणना होगी और तस्वीर साफ हो जाएगी कि इस बार छत्तीसगढ़ के गढ़ पर किसका कब्जा होता है ?

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