आर्थिक 'आपातकाल' की दूसरी बरसी !

नई दिल्ली: 8 नवंबर 2018 को नोटबंदी यानि डिमॉनीटाइजेशन के दो साल हो गए। इन दो सालों में देश ने क्या
पाया और क्या खोया ? नोटबंदी को लेकर जनता यही सोच रही है। वो सोच रही है कि नोटबंदी के दूसरे सालगिरह पर वो जश्न मनाए या फिर मातम? दरअसल नोटबंदी को लेकर कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल बीजेपी और मोदी सरकार पर हमलावर हो गए हैं। उनका आरोप हैं कि मोदी सरकार ने नोटबंदी लागू करके भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया। कांग्रेस का आरोप है कि नोटबंदी से 35 लाख नौकरियां और 105 लोगों की जान चली गई। वहीं नए नोटों की छपाई पर 8 हजार रुपए खर्च हुए। पूर्व प्रधानमंत्री और आर्थिक मामलों के जानकार मनमोहन सिंह ने कहा कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की हुई 'तबाही' सबके सामने हैं। इससे देश का हर व्यक्ति प्रभावित हुआ है। अब स्थिति ये है कि मोदी सरकार RBI के 3 लाख करोड़ रुपए पर अपनी नजर लगाए हुए हैं ताकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके। यदि सरकार के हाथ रिजर्व बैंक के तीन लाख करोड़ रुपए लग जाते हैं तो फिर देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाएगी। वहीं नोटबंदी का बचाव करते हुए वित्त मंत्री का कहना है कि नोटबंदी का मकसद कैश को जब्त करना नहीं था, बल्कि उसे अर्थव्यवस्था में लाना था। अब ये सवाल कांग्रेस वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री से पूछ रही है कि कैश अर्थव्यवस्था में आया क्या ? काला धन बाहर निकला क्या ? आतंकियों को आर्थिक मदद मिलनी बंद हुई क्या ? कांग्रेस ने नोटबंदी से देश को हुए नुकसान के लिए पीएम मोदी से मांग की है कि वो इसके लिए देश की जनता से माफी मांगें। वैसे भी दो साल पूरे होने के मौके पर कांग्रेस शुक्रवार को प्रदर्शन करेंगी। कांग्रेस ने नोटबंदी से हुई परेशानियों की याद दिलाने के लिए सड़कों पर उतरने का फ़ैसला किया है। कांग्रेस ने नोटबंदी को मोदी सरकार की बड़ी नाकामी बताया है।  आंकड़ों पर गौर करें तो नोटबंदी को लेकर दावा किया जा रहा है कि 99.3 प्रतिशत पुराने नोट वापस आ गए। वित्त वर्ष 2016-17 की सालाना रिपोर्ट में RBI ने बताया कि अवैध घोषित 15.44 लाख करोड़ रुपये में से 15.31 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए। यानि अवैध घोषित कुल 99.3% नोट बैंकों में जमा कर दिए गए जबकि 10,720 करोड़ रुपये मूल्य के महज 0.7 प्रतिशत नोटों का पता नहीं चल पाया। 8 नवंबर 2016 को जब मोदी सरकांर ने नोटबंदी का ऐलान किया उस समय 500 रुपये के 1716.5 करोड़ नोट प्रचलन में थे वहीं 1000 रुपये के 685.8 करोड़ नोट सर्कुलेशन में थे। दोनों का कुल मूल्य 15.44 लाख करोड़ रुपये था। RBI का कहना है कि एक हजार रुपए के 8.9 करोड़ नोट यानि 1.3 प्रतिशत नोट बैंकिंग सिस्टम में नहीं लौटे। नोटबंदी के बाद सरकार ने डिजिटल भुगतान पर ज्यादा जोर दिया था। उसका असर भी हुआ डिजिटल लेन-देन में तेजी आई। मगर यहां बड़ा सवाल यही है कि जब आपने तिजोरियों से काले धन या नोटों को बाहर निकालने के लिए अचानक 500 और 1000 के नोट बंद कर दिया तो फिर 2000 के नोट छापने की क्या जरूरत पड़ गई । क्या 2000 रुपए के नोट तिरोजियों में काले धन के रूप में नहीं सहेजे जा सकते हैं। अब तो कम जगह में ज्यादा काला धन रखा जा सकेगा और सरकार सिर्फ और सिर्फ देखती रह जाएगी। 

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